हमारे साथी जो कभी हमारे दिन-रात के सहचर थे, कदम से कदम मिलाकर चलते थे,
अपूर्णता को पूर्णता मे परिवर्तित करने के लिए अपनी सतत साधना मे सलग्न
थे, महान लक्ष्य की प्रापित ही जिनकी एकमात्र आकांक्षा थी, लोभ-मोह के
बंधनों को जिनने काफी ढीला कर लिया था,जिन पर हमे हर्ष ओर गर्व था, वे अब
न जाने किससे शापित होकर नजर में जा गिरे और अपनी पूर्व जन्मों की
सिथति, परिसिथति एवं प्रवृति को बुरी तरह भूल गए। जिनके जीवन दीप अपने
आप मे प्रकाशमान थे, दुुसरों के प्रकाश गृह थे, अब व्र लगभग बुझ गए।
उच्च आत्माए जो अनने को प्रकाशवान का चुकीं थी ओर जिनके
प्रकाश का लाभ सुदूर क्षेत्र में व्याप्त होने की आशा थी, वे बुझ जाये
तो यह एक बड़ी दुर्घटना एवं भयंकर सार्वजनिक हानी की बात है । लोभ मोह के
जाल-जंजाल मे जकड़ा हुआ जन-जीवन नर-पशुओं के लिए क्षम्य हो सकता है।
जिनकी मनुष्यता जाग गर्इ उनके लिए वह स्तर ऐसे ही उपहासास्पद है, जैसे की
कोर्इ बड़ी आयु का व्यकित बालकों जैसे खिलोनों से खेले,घुटनों के बल चले
और वेसी ही बोली बोले। प्रबुद्ध आत्मायें धर्म और
ब्र्र्र्र्र्र्रह्राज्ञान की वाचालता नही दिखाती फिरतीं, वे उन आदर्शो
को जीवनक्रम में उतारती है । वेदांत जिनकी जीभ तक सीमित रह
गया,व्यावहारिक जीवन में न उतरा, समझा चाहिए वे प्रगति पथ पर न चल सके,
विडम्बना के दलदल में फँस गए।
हमारे साथी-सहचरों की, सच्चे अर्थो मे माने जाने वाले
योग्य कुटुंबियों की यही दुर्गति हुर्इ है। जिन्हे आज देश का,विश्व का
नेतृत्व करना था, युग परिर्वतन की प्रभु इच्छा के अनुरूप उनके संकेंतो पर
बड़े काम करने के लिए तत्पर होना था, इस विश्व संकट कं दिनों में
एतिहासिक भूमिका का सम्पादन करना था, उनकी गतिविधियाँ इतनी ओछी,संकीर्ण
एवं कृपण हो जायें कि पेट और प्रजनन के दो ही लक्ष्य शेष रहें ता समझाना
चाहिए कि एक भयंकर दुर्घटना हो गर्इ, आध्यातिमक जगत में एक भारी व्यवधान
उत्पन्न हो गर्इ। पृ 11
–Pandit Sriram Sharma Acharya