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जागरूक आत्माओं का विशेष कर्तव्य
युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपनी विशिष्ट सिथति का
मुल्यांकन करना चाहिए और अपने को विशेष उद्धेश्य को लेकर अवतरित हुआ
मानना चाहिए। वह अपने को जागरूक रखे और मुच्र्छा मे पड़े हुए अथवा दिवा
स्वप्न देखने वाले मूढ़ मति लोगों को जगाने की जिम्मेदारी संभाले। आँधी
मे उडने-फिरने वाले पत्तों की तरह उसे निष्प्रयोजन इधर-उधर उड़ते फिरना
नही है। वरन समुद्र मे खड़े हुए प्रकाश स्तंभों के समतुल्य बनना है जो
घोर अंधकार में स्वमं चमकते रहतें है ओर अपने प्रकाश से उधर से निकलने
वाले जहाजों को डूबने से बचाते हैं। इस लक्ष्य को हमें अपने जीवनक्रम
में,दृषिटकोण में समिमलित करना चाहिए और तदनुरूप अपनी गतिविधियों का
निर्धारण करना चाहिए।
व्यकित और समाज किस प्रकार विपन्न परिसिथतियों मे गिरते
चले जा रहे है यह देखकर भविष्य अंधकारमय बनता जा रहा है। हम सचमुच
जीवन-मरण के दुराहे पर खड़े है जीवन इस असंमजस में घिरा खड़ा है कि हमारा
क्या होना है। हमारा असितत्व अगलें दिनों रहना है या उसकी इतिश्री होने
की घड़ी आ गर्इ। जिस राह पर यकित और समाज ने चलने की ठानी है वह अत्यन्त
भयावह है। हर क्षेत्र की हर सिथति उलझी चली जा रही है और गतिरोध ने आगे
बढ़ने का रास्ता बंद कर दिया है। विवेक किंकर्तव्यविमूढ़ होकर हतप्रभ
बना खड़ा है। सूझ नही पड़ता आगे क्या होना, क्या किया जाना है।
समय की इस विषम वेंला मे जागरूक आत्माओं का विशेष
कर्तव्य है। युग निर्माण परिवार को इस आपतित काल में अपनी विशेष भूमिका
निभानी है। उसे सामान्य नर कीटकोें की तरह पेट-प्रजनन के लिए नही जीना
है। हमें अपनी विशिष्ट सिथति का अनुभव बार-बार करना चाहिए। उँचा उठकर
सौचना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे उँचे आदर्शों का निर्बाह होता
हों। युग की उलझी हुर्इ समस्याओं को सुलझाने में हमें कुछ तो करना ही
होगा। अपनी जागरूकता का परिचय दिय बिना अब काम चलेगा नही। पृ 26
–Pandit Sriram Sharma Acharya