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प्रतिभा की पुकार
अपने युग का सबसे बड़ा उत्पादन यही हो सकता है।कि जन मानस पर प्रभाव छोड़
सकने वाले प्रतिभा संपन्न लोकनायक उत्पन्न किए जायें। वे जिस स्तर के
जितने अधिक उत्पन्न होंगे,उसी अनुपात मे लोक मानस में उत्कृष्टता का भी
तत्व भरते जायेंगे। बर्बादी और विध्वंश मे लगी हुर्इ शकितयाँ जब
सृजनात्मक प्रयोजनों मे जुट जाएँगी तो तो जिस तेजी से अध:पतन की
परिसिथतियाँ उत्पन्न हुर्इ हैं, उसी अनुपात से सृजनात्मक गतिविधियाँ चल
पडे़गी। हर मनुष्य जब उत्थान की बात सोचेगा, सत्प्रयोजन मे निरत रहेगा ता
बिना किसी योजनाबद्ध व्यवस्था के बनाए हुए अपेक्षित नव निर्माण के
असंख्यों आधार अनायास ही खड़े होते चले जायेंगे। मनुष्य की उत्पादन शकित
असीम है। उसके पास सामथ्र्य की कमी नहीं। साधनों की मात्रा उतनी है। जिसे
विपुल कहा जा सके। इन दिनों समस्त संपदा की या तो बर्बादी होती है।
जनमानस का प्रवाह उलट सके ओर विनाश,को बर्बादी को विकास के लिए प्रस्तुत
किया जा सके तो उज्ज्वल भविष्य के अवतरण में तनिक भी देर लगेगी।
जनमानस की युग प्रवाह को उलट सकने में समर्थ प्रतिभाओं
की इन दिनों अत्यधिक आवश्यकता है। यह विभुतियाँ उपजें और भागिरथ तप-साधना
का मार्ग अपनायें तो कार्इ कारण नहीं कि परम पावनी नवयुग की पवित्र धारा
पतित पावनी गंगा की तरह इसी धरती पर प्रवाहित न होने लगे। यह
युग-भागीरथ,अन्यत्र कहीं नही मिलेंगे, इन्हें वानप्रस्थ को पुनर्जीवित
करके इसी खदान मे से खोद कर निकालना पड़ेगा। नर रत्न इसी रत्नाकार में से
उपलब्ध होते रहे है। आज भी हमारी दृषिट इसी क्षेत्र पर केनिद्रत है।
–pandit sriram sharma acharya