TheIntRendz

Home » personal (Page 5)

Category Archives: personal

स्वतंत्र विवेक के आधार पर आत्म निर्माण करें

अपने परिवार मे हमें बड़ी-बड़ी आशाएँ थी। उनके आध्यातिमक बीजांकुरों को 
फलता-फूलता देखने का अपना मन था। भजन-पूजन को हम आध्यातिमकता का एक 
औजार-उपकरण मात्र मानते है। किसी में अध्यात्मका प्रकाश आया या नही – 
इसकी दो ही परख हो सकती है कि आत्म निर्माण के लिए उनके प्रयत्न कितने 
तीव्र हुए और उनकी उदारता लोकमंगलकी दिशा मे कितनी विकसित हो सकी। जो 
आध्यातिमकता पूजा-पाठ,तिलक छापा और कर्मकांडों तक सीमित रह जाय उसे 
निर्जीव निष्फल ही कहा जायेगा। एसी निर्जीव उपासना भरी पूजा-उपासना में 
उलझे हुए अपने कितने ही साथी हैं जो धार्मिक कर्मकांडों में तो बहुत समय 
लगाते है। पर जिनने भावनात्मक आत्म निर्माण के लिए कुछ भी नही किया, आत्म 
निर्माण और आत्म सुधार की दिशा में जिनकी रूचि ही नही बड़ी ओर लोक मंगल 
के लिए त्याग-बलिदान करने के लिए जिनमें कोर्इ उत्साह पेदा नहीं हुआ। एसी 
निर्जीव आध्यातिमकता में संलग्न किसी का देखते है। तो र्इतना ही सोचते है 
बेचारा कुमार्गगामी कार्यो से बचकर इस गोरखधंधे मे लग गया तो कुछ अच्छा 
ही हे। अचछार्इ का नाटक भी अच्छा है। इस दृषिट से जो ठीक है। पर काम तो 
इतने मात्र से चलता नहीं। प्रखर और सजीव आध्यातिमकता तो वह है जिसमें 
अपने आप का निर्माण दुनियाँ वालों की अंधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं वरन 
स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके। सच्ची आध्यातिमकता तो वह 
है जो वासना-तृष्णा की परिधि से साधक को उपर उठा दे और वैयäकि ही नहीं 
सामूहिक कर्तव्यो के पालन में शौर्य और साहस को पर्याप्त मात्रा में 
उत्पन्न कर दे। एसी प्रखर आध्यातिमकता अपने कितने साथीयों मे 
उगी,बढ़ी,परिपुष्ट हुर्इ-इसका लेखा झोका लेने बैठते हैं तो चित्त मे भारी 
निराशा उत्पन्न होती है। पर इस निराश सिथति से क्षुब्द्ध होकर हम हतप्रभ 
नही हो सकते। खिन्न होकर नियत कर्तव्यो को छोड़ देना भी हमे नही आता है। 
जिन्हे प्यार करेंगे ओर मित्रता का कर्तव्य-कुपथ विवारण व सुपथ चलाने 
वाली उकित को सदा निबाहेंगे। पृ 12 

 

–Pandit Sriram Sharma Acharya