आत्मिक-प्रगति का पहला कदम यही हो सकता है कि हम अपना जीवनोद्देश्य निश्चित करें, लक्ष्य को स्थिर करें। यह लक्ष्य प्रेय नहीं श्रेय ही हो सकता है। प्रेय पथ पर सरपट तेजी से दौड़ती हुई जीवन की गतिविधि को मोडक़र श्रेय पथ पर चलना है, तो उसे मोड़ देते समय कुछ अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। भोग के स्थान पर संयम और विलास के स्थान पर तप की स्थापना करने से ही इस प्रकार का मोड़ दिया जा सकना संभव है।
शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं। इसमें अत्यधिक आसक्ति का होना, इसी के सुख, भोग, लाभ और ऐश्वर्य में ही अपनी अभिरुचि केंद्रित कर लेना, अन्नमय कोष में आबद्ध होना है। पाँचों बंधन काटने का श्रीगणेश यहीं से आरंभ करना होगा। सबसे पहला प्रयत्न हमें यह करना है कि आत्मा के सुख को, लाभ को अपना वास्तविक लाभ मानते हुए उसे ही प्राथमिकता दें। इसके लिए यदि शरीर-सुख में कोई कमी आती हो, तो उसे खुशी-खुशी स्वीकार करने को तत्पर हों। इस मान्यता को विचारों तक ही सीमित न रख कर व्यवहार में उतारने की प्रक्रिया का नाम ‘तप’ है। साधनापथ का पहला चरण तप ही है। अन्नमय कोश की, शरीर-भाव की आसक्ति घटाने का प्राथमिक उपाय तप ही है। संचित कुसंस्कार तप की अग्नि में तपाए बिना जल नहीं सकते। इसलिए किसी न किसी रूप में अध्यात्म मार्ग के पथिक को ‘तप’ को अपने कार्यक्रम में स्थान देना ही पड़ता है।
लाल मशाल
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