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मानवदेह का सदुपयोग

मानवदेह का सदुपयोग
    यह शरीर ही इंद्रियों के स्वामी (आत्मा) का निवास स्थान है और इसमें निवास करता हुआ, वह ऐसे सुकर्म रूपी उत्तम अन्नों की खेती कर सकता है, जिससे यह जीवन सुख-शांति से भरपूर हो जाए। यदि मनुष्य इस वेदोपदेश का पालन करेगा, मानव देह को झूठे भोगों में लिप्त न करके, उसके द्वारा उत्तम कार्य करने का ध्यान रखेगा, तो अवश्य ही उसका जीवन उच्च स्थिति को प्राप्त होता जाएगा और वह सांसारिक पाप-ताप से पृथक्ï रह कर और परलोक में सुख-सुयश का भागी बन सकेगा।
    वह अपने उद्योग द्वारा इस लोक की सुख सुविधाओं को ही प्राप्त नहीं करेगा, वरन्ï परलोक का भी सुधार कर लेगा। भगवान् ने अधिक नहीं तो इतनी शक्ति प्रत्येक प्राणी को दी है कि वह संसार में स्वावलंबनपूर्वक जीवन-निर्वाह कर सके। यदि कोई इसमें असफल रहता है, तो हमको निश्चित रूप से यह समझ लेना चाहिए कि वह मानव देह का उचित उपयोग नहीं कर रहा है और न अपने कत्र्तव्य का पालन करने की ओर उसका लक्ष्य है। वह संसार में शारीरिक और मानसिक काम से बच कर दूसरों की मेहनत के सहारे जीवन व्यतीत करना चाहता है। जब इसमें बाधा पड़ती है, तो वह संसार भर को कोसता है और अपना समस्त दोष दूसरों के सिर पर मढऩे की चेष्ट।
करता है।

—Akhand jyoti