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अनुकरणीय जीवन जिएँ
अनुकरणीय जीवन जिएँ
वह जीवन ही क्या, जिसमें परमार्थ के लिए कोई स्थान न हो । वह मनुष्य ही क्या, जो अपने पीछे कुछ आदर्श और अनुकरणीय उदाहरण न छोड़ जाए। मानव-जीवन की जिम्मेदारी महान्ï है। केवल आजीविका-उपार्जन करते रहना, यह तो निर्जीव जीवन है। जिनके भीतर कुछ चेतना, जाग्रति एवं ज्योति होती है, उनका जीवनक्रम केवल साँसें पूरी करने में समाप्त नहीं होता। उनकी अंतरात्मा स्वयं ऊँची उठती है और दूसरों को ऊपर उठाने में अपने लक्ष्य की पूर्ति अनुभव करती है।
अधिक धनी-मानी बनने के लिए कौन प्रयत्न नहीं करता? यह तो चींटी और दीमक भी करती हैं, पर धन्य उसी का जीवन है, जिसने अपनी अंतरात्मा के सद्ïगुणों को विकसित करने में सफलता पाई, जिसने अपने समाज को, राष्र को, विश्व-मानव को अधिक गौरवान्वित, अधिक सुख-शांतिमय परिस्थितियों में पहुँचाने का प्रयत्न किया। यही जीवन-दर्शन है। जिसने इस तथ्य को समझा और व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित किया, वस्तुत: वही सच्चा बुद्धिमान है। यों हर आदमी अपने को चतुर और बुद्धिमान कहता है, पर इस क्षणभंगुर शरीर के समाप्त होने पर जिन गतिविधियों के लिए आत्मा को पश्चात्ताप नहीं, प्रसन्नता अनुभव हो, वस्तुत: सच्ची बुद्धिमता वही है।
–pandit sriram sharma acharya ji