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Tag Archives: Pandit sriram sharma acharya
हम नही, हमारा मिशन ही सर्वोपरी है
जो हमेे प्यार करता हो, उसे हमारे मिशन से भी प्यार करना
चाहिए। जो हमारे मिशन की उपेक्षा-तिरस्कार करता है, लगता है। वह हमें ही
उपेक्षित-तिरस्कृत कर रहा है। व्यकितगत रूप से कार्इ हमारी कितनी ही
उपेक्षा करे पर यदि हमारे मिशन के प्रति श्रद्धावान है और उसके लिए कुछ
करता सोचता है तो लगता हे। मानों हमारे उपर अमृत बिखेर रहा है। और चंदन
लेप रहा है। किन्तु यदि केवल हमारे व्यकितत्व के प्रति ही श्रद्धा है,
शरीर से ही मोह है। उसी की प्रशसित-पूजा की जाती है और मिशन की बात उठाकर
ताक पर रख दी जाती है। तो लगता हमारे प्राण का तिरस्कार करते हुए केवल
शरीर पर पंखा हिलाया जा रहा है।
लोगों कि द्रषिट में व्यकित पूजा प्रर्याप्त है। मिशान कें झंझट
में पड़नें की जरूरत नहीं। अपनी द्रषिट में शरीर पुजा बुतपरस्ती मात्र
है। देव पुजा तो श्रद्धास्पद के प्रण प्रवाह के साथ बहने से है। अपनी
मनोदशा मिशन को आगे बढ़ते देखकर प्रसन्न और संतुष्ट होने कि है। अब उसी
में अपना सारा आनन्द-उल्लास केन्दि्रभुत हो गया है।
किसी सें हमारी कितनी निकटता है उसकि परख हम किसी कसौटि पर
कसते हैं कि उसने हमारे कंधे से कंधा मिलाकर कितना भार बंटाया और हमारे
कदमो से कदम मिलाकर कितनी सहयात्रा कि। निंदा-स्तुति अपने लिय समान है।
जब व्यकितत्व रहा हि नहीं, मिशन में घुल गया तो उस मृतपाय सत्ता सें
शरीर-कलेवर सें अपना मोह हि क्या है ? फिर उसकि पुजा-प्रसंशा और
अभ्यर्थना का अपने उपर क्या प्रभाव पडे़ ? कामनाऔ, आकांक्षाओ और अभावो की
सांसारिक सीमा समाप्त हो गर्इ तो उसकि उपल्बधी में रस भी क्या रहा ? अपनी
सारी सरसता अब अपने लक्ष्य-मिशन में है। उसी क्षेत्र की उत्साहवद्र्धक
हलचल आशा, दल्लास और संतोष की भुमिका प्रस्तुत करती है। पृ 9
–Pandit Sriram Sharma Acharya