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परिवर्तन विश्व का होना है

युग परिवर्तन के शब्द कहने और सुनने में सरल मालूम पड़ते 
है। पर विश्व की अगणित धाराओं के उल्टी दिशा में बहने वाले प्रचंड प्रवाह 
को मोडने के लिए कितनी-किस स्तर की शकित चाहिए, इसका लेखा-जोखा तैयार 
करने पर विदित होता है। कि बड़े काम के उपयुक्त ही बड़े साधन सँजोने 
पड़ेंगे। पड़ेंगे। यह सरंजाम जुटाना न तो सरल है और न उसका स्वरूप 
स्वल्प है। विश्व बड़ा है,उसकी समस्याएँ बड़ी है, उसकी समस्याएँ बड़ी है। 
इतने विशाल क्षेत्र की उलझानों को सुलझाने के लिए कितना कुछ करना 
पड़ेगा इस पर गंभिरतापूर्वक विचार करना होगा। 

अगले दिनों उसकी वर्तमान सीमाएँ अत्यंत विस्तृत होकर 
असीम हो जायेंगी। तब किसी एक संस्था-संगठन का नियत्रण-निर्देश नही चलेगा 
वरन कोटि-कोटि घटाकों से विभिन्न स्तर के ऐसे ज्योतिं पुंज फूटते दिखार्इ 
पड़ेगे जिनकी अकूत शकित द्वारा संपन्न होने वाले कार्य अनुपम और अदभुत ही 
कहे-समझे जायेंगे। महाकाल ही इस महान परिवर्तन का सूत्रधार है । कही 
समयानुसार अपनी आज की मंगलाचरण थिरकन को क्रमश: तीव्र से तीव्रतर तीव्रतम 
करता चला जायेगा। तांडव के नृत्य से उत्पन्न गगनचुंबी जाज्ज्वल्यमान 
आग्नेय लपटों द्वारा पुरातन को नूतन में परिवर्तन करने की भूमिका किस 
प्रकार किस रूप मे अगले दिनों संपन्न होने जा रही है, आज उस सबको सोज 
सकना,कल्पना परिधि में ला सकना सामान्य बुद्धि के लिए प्राय: असंभव ही 
है। फिर भी जो भवितव्यता है वह होकर रहेगी। युग को बदलाना ही है। आज की 
निविड़ निशा का कल के प्रभातकालिन अरूणोदय में परिवर्तन होकर ही होगा। 

परिवर्तन विश्व का होना है। निर्माण समस्त जाती का होना। 
धरती पर स्वर्ग का अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय किसी देश, 
जाति,धर्म,वर्ग तक सीमित नही रह सकता,उसे असीम ही बनना पड़ेगा। इन 
परिसिथतियों में युग निर्माण प्रक्रिया का विश्वव्यापी होना और अपना 
कार्यक्षेत्र उसी स्तर पर विकसित होना स्वाभाविक है।पृ 34 

–Pandit Sriram Sharma Acharya.