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आत्मशोधन अध्यात्म का श्रीगणेश
आंतरिक परिष्कार की ओर समुचित ध्यान देना, यही बुद्धिमता और दूरदर्शिता का प्रथम चरण है। अध्यात्म का पहला शिक्षण यही है कि मनुष्य अपने स्वरूप को समझे। यह सोचे कि मैं कौन हूँ? क्या हूँ? और क्या बना हुआ हूँ? आत्म-चिंतन ही साधना का प्रथम सोपान कहा जाता है। यह चिंतन ईश्वर, जीव, प्रकृति की उच्च भूमिका से आरंभ नहीं किया जा सकता। कदम तो क्रमश: ही उठाए जाते हैं। नीचे की सीढिय़ों को पर करते हुए ही ऊपर को चढ़ा जा सकता है। सोऽहम्, शिवोऽहम् की ध्वनि करने से पूर्व, अपने को सच्चिदानंद ब्रह्म मानने से पूर्व, हमें साधारण जीवन पर विचार करने की आवश्यकता पड़ेगी और यह देखना पड़ेगा कि ईश्वर का पुत्र, जीव आज कितने दोष-दुर्गुणों से ग्रसित होकर पामरता का उद्विग्र जीवनयापन कर रहा है। माया के बंधनों ने उसे कितनी बुरी तरह जकड़ रखा है और षट्रिपु पग-पग पर कैसा त्रास दे रहे हैं। माया का अर्थ है, वह अज्ञान जिससे ग्रस्त होकर मनुष्य अपने को निर्दोष और सारी परिस्थितियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी मानता है। भवबंधनों से मुक्ति का अर्थ है, कुविचारों, कुसंस्कारों और कुकर्मों से छुटकारा पाना। अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद, इस संसार में और कोई नहीं हो सकता। इसका मूल्य जीवन की असफलता का पश्चाताप करते हुए ही चुकाना पड़ता है।
–pandit sriram sharma acharyaji