Home » Articles posted by anshumanbiswal (Page 13)
Author Archives: anshumanbiswal
युगऋषि की अपेक्षाएँ हम सबसे
युग पुरूष के चरणों पर गायत्री परिवार की जो भावभरी माला सर्वप्रथम समर्पित की जा रही है, उसका अति महत्वपूर्ण मणि मुक है। उसे ऐतिहासिक भूमिका संपादन करने का अवसर मिला है। इस अभियान के संचालको ने असे प्रयत्नपूर्वक ढ़ूँढ़ा, सँभाला और भावभरी अभिवयन्जनाओं से सींचा-सँजोया है। उसे तुच्छता से ऊँचे उछना और महानता का वरण करना है। इसके लिए अवसर उसके सामने गोदी पसारे, चुनौती लिए हुए सामने खड़ा है। आत्मबोध की दिव्य ज्योति से अपने आपको ज्यातिर्मय बनाया जाना चाहिए। इतिहास जिन युग निर्माताओं की खोज मे है, उसे उनकी पंä मिें अपना आगा-पीछा सोचे
साहसपुर्वक जा बैठना चाहिए।
इस संध्याकाल में सभी उच्च आत्माएँ महाकाल का पुण्य प्रयोजन पूर्ण करने के लिए विधमान है। वीर बालक इन दिनों मौजुद हैं। वे साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं, पर अगले ही दिनों उनको असाधारण बनते देर नहीं लगेगी। यह सब महाकाल का युग निर्माण प्रत्यावर्तन-महारासका दिव्य दर्शन जैसी ही अदभुत घटना होगी।
यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिए कि परिवर्तन प्रक्रिया की अभीष्ट पृष्ठभूमि तैयार करने की र्इश्वरीय जिम्मेदारी कुछ विशेष आत्माओं पर सौंपी गर्इ हैं। उनमें से बहुत कुछ को गायत्री परिवार के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है। जो बाहर हैं, वे ब्यक्ति अगले प्रवाह में साथ हो लेंगी। यों देखने में हम एक साधारण स्तर का जीवन जीतें हैं और बाहर से कोर्इ विशेषता अपने अन्दर दिखार्इ नहीं पड़ती, फिर भी परमार्थ प्रयोजनों के लिए बहुत
कुछ कर गुजरने की अभिलाषा एक ऐसा तत्त्व है, जिसे र्इश्वरीय प्रकाश एवं पूर्व जन्मों के संचित उत्कृष्ट संस्कारों का प्रवाह कह सकते हैं। अपने गायत्री परिवार की यही विशेषता है।
गायत्री परिवार में एक से एक बढ़कर उत्कृष्ट स्तर की आत्माएँ इन दिनों मौजूद हैं। वे जन्मी भी इसी प्रायोजन के लिए हैं। ऐसे महान अवसरों पर उत्कृष्टता संपन्न सुसंस्कारी आत्माएँ ही बड़ी भूमिकाएँ प्रस्तुत करने का साहस करती हैं। आंतरिक साहस उनकी सांसारिक सुविधाओं को मकड़ी के जाले की तरह तोड़-फोड कर रख देता है और लगता है कि यह ब्यक्ति अपनी विषम परिसिथतियों के कारण कोर्इ कहने लायक काम न कर सकेगा। देखा जाता है कि वही ऐतिहासिक महापुरुष स्तर के काम करता है।
+ यह और कुछ नहीं, उत्कृष्ट सुयोजनों के लिए दुस्साहस कर बैठने की हिम्मत हीहै। जिसे र्इश्वरीय प्रेरणा के रूप में परखा जा सकता है। हममें से अनेकों परिजन अभी अपनी ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करने की बात सोच रहे हैं। कर्इ उसके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। कर्इ दुस्साहसपूर्वक अग्रगामी होने की सिथति को छू रहे हैं-यह शुभ लक्षण है।
+ जिन्होंने अतीत में अपने-अपने समय पर महामानव, युग पुरुष, लोकनायक और वीर बलिदानी बनने का महानतम गौरव प्राप्त किया है, वे उस अनुपम, अलौकिक आनंद का रससस्वादन जानते हैं। अतएव जब अवसर आता है, तब उस सुअवसर का लाभ उठाने के लिए सबसे आगे आ जाते हैं।
+ इतिहास अपनी पुनरावृत्ति कर रहा है। अपना गायत्री परिवार एक र्इश्वरीय महान प्रयोजन की पूर्ति में सहायक बनने के लिए पुन: इकट्टा हुआ है। अच्छा हो हम अपने को पहचानें और अतीत काल की सूखी स्मृतियों को फिर हरी कर लें। निशिचत रूप से हम एक अत्यन्त घनिष्ठ और निकटवर्ती आत्मीय परिवार के चिर आत्मीय सदस्य रहते चले आ रहे हैं।
+ नर पशुओं और नर पिशाचों का बाहुल्य जब कभी भी संसार में होगा, तो विपत्तियों आयेंगी और अगणित प्रकार की विभीषिकाएँ उत्पन्न होंगी।
+ आशा करनी चाहिए कि वह दिन हम लोग अपनी इन्ही आँखों से इसी जीवन में देखेंगे, जबकि अगणित देव प्रवृत्ति के व्यकित अपने-अपने स्वार्थों को तिलांजलि देकर विश्व के नव निर्माण में ऐतिहासिक महापुरुषों की तरह प्रवृत्त होंगे और इन दिनों जिस पशुता एवं पैशाचिक प्रवृत्ति ने लोकमानस पर अपनी काली चादर बिछा रखी है, उसे तिरोहित करेंगे। अनाचार का अंत होगा और हर व्यकित अपने चारों ओर प्रेम, सौजन्य, सदभाव, न्याय, उल्लास, सुविधा एवं सज्जनता से भरा सुख-शानितपूर्ण वातावरण अनुभव करेगा। उस शुभ दिन को लाने का उत्तरदायित्व देव वर्गका है।
+ पूर्व जन्मों की अनुपम आतिमक संपत्ति जिनके पास संग्रहीत है, ऐसी कितनी ही आत्माएँ इस समय मौजूद हैं। पिछले कुछ समय से अनुपयोग परिसिथतियों में पड़े रहने से इन फौलादी तलवारों पर जंग लग गयी। इस जंग को छुड़ाने की प्रक्रिया युग निर्माण योजना के प्रस्तुत कार्यक्रमों के अंतर्गत चल रही है। आशा करनी चाहिए कि अगले दिनों में यह प्रयोजन पूर्ण कर लिया जाएगा।
+ इन दिनों जो व्यकित बिलकुल साधारण स्तर के दिखार्इ पड़ते हैं और जिनसे किसी बड़े काम की संभावना नहीं मानी जा सकती, ऐसे कितने ही व्यकित असाधारण प्रतिभा और क्षमता लेकर कार्यक्षेत्र में उतरेंगे और नव निर्माण का महान कार्य जो आज एक स्वप्न मात्र दिखार्इ पड़ता है, कल मूर्तिमान सच्चार्इ के रूप में प्रस्तुत करते परिलक्षित होंगे।
+ देवमानवों का अवतरण समयानुसार हो चुका है। वे इतने समर्थ हो गये कि अपने उददेश्य युग अवतार के सहभागी बनने की भूमिका को निभा सकें। प्रज्ञा परिजनों को अपने हिस्से का उत्तरदायित्व अंत: प्रेरणा से प्रेरित होकर स्वयं ही अपने कंधे पर वहन करना है। उसी में उसके वर्चस्व की सार्थकता है।
+ महानता के श्रेयाधिकारी देवदूतों के उत्तराधिकारी बनने का लाभ उन्हें ही मिलता है, जो आदर्शवादियों की अगि्रम परीक्षा में खड़े होते हैं और बिना किसी के समर्थन-विरोध की परवाह किए आत्म-प्रेरणा के सहारे स्वयमेव अपनी दिशा-धारा का निर्माण निर्धारण करते हैं।
+ जाग्रत आत्माओं का देव परिवार युग परिवर्तन की सामयिक माँग को पूरा करने के लिए अदृश्य शकित की योजना एवं प्रेरणा के अनुरूप गठित हुआ है। प्रज्ञा परिवार के हर सदस्य को युगसंधि की प्रभात वेला में अपने कंधा पर आये उत्तरदायित्वों को निभाना है। युगसंधि के ऐतिहासिक अवसर पर अग्रगामी ही सुयोग-सौभाग्य को पहचानते, साहसपूर्वक आगे बढ़ते और अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए असंख्यों में अनुकरण का उत्साह भरते हैं। नवसृजन के युग निमंत्रण को भी जाग्रत आत्मा अस्वीकार न करे। जिसे जैसा उत्साह एवं अवसर हो, वह न्यूनाधिक परिमाण में अपने योगदान को समिमलित करे ही।
+ युग निर्माण परिजनों को जेवर-जायदाद बनाने की नहीं, विश्व निर्माण की योजनाएँ बनानी चाहिए। ऐसा करने में ही युग सेनानी-युग निर्माताओं के अनुरूप शान रहेगी।
+ युग निर्माण परिवार जाग्रत और सुसंस्कारी आत्माओं का समूह
है। नव जागरण का प्राथमिक श्रेय निशिचत क्रम से सुसंस्कारी जाग्रत आतमाओं
को मिलेगा। वे ही आगे आयेंगी, मशाल की तरह जलेंगी और सर्वत्र प्रकाश
उत्पन्न करेंगी।
+ युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को यह देखना है कि वह
लोगों को क्या बनाना चाहता है, उनसे क्या कराना चाहता है? उसे भावी
कार्यपद्धति को, विचार शैली को पहले अपने ऊपर उतारना चाहिए, फिर अपने
विचार और आचरण का समिमश्रण एक अत्यन्त प्रभावशाली शकित उत्पन्न करेगी।
अपनी निष्ठा कितनी प्रबल है, इसकी परीक्षा पहले अपने ऊपर ही करनी चाहिए।
यदि आदर्शों को मनवाने के लिए अपना आपा हमने सहमत कर लिया, तो नि:संदेह
अगणित व्यकित हमारे समर्थक, सहयोगी, अनुयायी बनते चले जायेंगे। फिर युग
परिवर्तन अभियान की सफलता में कोर्इ व्यतिरेक शेष न रह जाएगा।
+ महाकाल की युगान्तरीय चेतना ने उन सुसंस्कारी आत्माओं को
ढूँढ़ा है, जिनके पास आत्मबल की पूर्व संचित सम्पदा समुचित मात्रा में
पहले ही विधमान थी। गायत्री यज्ञों के बहाने-सत्साहित्य के आकर्षण से,
व्यकितगत संपर्क की पकड़ से मणि मुक की उस स्फटिक माला में उन्हें गूँथा
है, जिसे युग निर्माण परिवार के नाम कहा-पुकारा जाता है।
+ युग परिवर्तन की घडि़यों में भगवान अपने विशेष पार्षदों को
महत्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पादित करने के लिए भेजता है। युग निर्माण परिवार
के परिजन निशिचत रूप से उसी श्रीन्खला की अविचिछन्न कड़ी हैं। उस देव ने
उन्हें अत्यन्त पैनी सूक्ष्म दृषिट से ढूँढ़ा और स्नेह सूत्र में पिरोया
है। यों सभी आत्माएँ र्इश्वर की संतान हैं, पर जिन्होनें अपने को
तपाया-निखारा है, उन्हें र्इश्वर का विशेष प्यार-अनुग्रह उपलब्ध रहता है।
+ र्इश्वर जिसे प्यार करते हैं, उसे परमार्थ प्रयोजनों की
पूर्ति के लिए स्फुरणा एवं साहसिकता प्रदान करते हैं। सुरक्षित पुलिस एवं
सेना आड़े वä पर विशेष प्रयोजनों की पूर्ति के लिए भेजी जाती हैं। युग
निर्माण परिवार के सदस्य अपने को इसी स्तर का समझें और अनुभव करें कि
युगान्तर के अति महत्वपूर्ण अवसर पर उन्हें हनुमान, अंगद जैसी भूमिका
संपादित करने को यह जन्म मिला हैं। युग परिवर्तन के क्रियाकलाप में
असाधारण आकर्षण और कुछ कर गुजरने के लिए सतत अंत:स्फुरणा का और कुछ कारण
हो ही नहीं सकता। हमें तथ्य को समझना चाहिए। अपने स्वरूप और लक्ष्य को
पहचानना चाहिए और अवतरण का प्रयोजन पूरा करने के लिए अविलम्ब कटिबद्ध हो
जाना चाहिए। इससे कम में गायत्री परिवार के किसी सदस्य को शानित नहीं मिल
सकती।
+ प्रतिभा की सर्वोपरि विभूति हम सबके पास प्रचुर परिमाण में
मौजूद है। किसने इसे कम निखारा, किसने अधिक इस भेद में न्यूनाधिकता हो
सकती है, पर जिस प्रकार प्रत्येक परमाणु में अजस्त्र शकित भरी है और
विस्फोट के अवसर पर उसकी प्रतिक्रिया स्पष्ट देखी जा सकती है, उसी प्रकार
प्रत्येक व्यकित में प्रतिभा मौजूद है। जाग्रत आत्माओं में तो वह सहज ही
अत्यधिक होती है। युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य में उसकी समुचित
मात्रा विधमान है। जो आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की उठती हुर्इ हिलोरों
के रूप में सहज ही जानी-परखी जा सकती है-इसे अगि्रप्रज्वलन की तरह तीव्र
से तीव्रतर व तीव्रतम किया जाना चाहिए। अन्धी भेड़ किधर-किधर जा रही है-
क्या चाह रही है, यह देखने की अपेक्षा परमेश्वर के संकेत को, युगधर्म को
शिरोधार्य करके ऐसे कदम बढ़ाने चाहिए, जो अपने लिए-संसार के लिए श्रेय
साधन प्रस्तुत कर सके। यदि ऐसा कदम बढ़ा सकना अपने लिए संभव हो सके, तो
महाकाल की एक महत्वपूर्ण माँग पूरी कर सकने में हमारी भूमिका
चिरस्मरणीय-ऐतिहासिक हो सकती है।
+ युग निर्माण परिवार इन दिनों भारत में एक सुधारवादी धर्म
संगठन के रूप मेंं दीखता है। कल उसकी भूमिकाएँ सर्वतोमुखी, सार्वभौम,
सार्वजनीन होंगी। अनेकता को एकता में परिणत करने वाले प्रयास कहाँ किस
तरह उभरते हैं ? उनके मनमोहन और आश्चर्यचकित करने वाले दृश्य देखने के
लिए प्रत्येक आँख वाले को अब तैयार ही रहना चाहिए।
+ हमने अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया है। अब आपका कत्र्तव्य
हैकि आप अपना कार्य आरम्भ कर दें। दोनों हाथों से ही ताली बजेगी। युग
निर्माण योजना साझे की खेती है। सब मिलकर कटिबद्ध होंगे, तो ही काम
चलेगा। शरीर के सभी अंग अपने-अपने हिस्से का काम ठीक तरह करते हैं, तो ही
स्वास्थ्य ठीक रहता है। यदि थोड़े से कम महत्वपूर्ण लगने वाल
अंग-प्रत्यंग भी अपना काम करना छोड़ दें, तो सारे शरीर के लिए विपत्ति
खड़ी को जाती है। घड़ी के पुर्जों की तरह अखण्ड ज्योति परिवार के हर
पुर्जे को अपने जिम्मे का काम निपटाने के लिए प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक
तत्पर हो जाना चाहिए।
+ युग निर्माण योजना कागजी या कल्पनात्मक नहीं हैं। वह समय
की पुकार, जनमानस की गुहार और दैवी इच्छा की प्रत्यक्ष प्रक्रिया है। इसे
साकार होना ही है। इसके आरंभ करने का श्रेय ‘अखण्ड ज्योति परिवार को मिल
रहा है।
+ हमारा ज्ञानयज्ञ इस युग का सबसे महान ऐतिहासिक अभियान है।
इसमें परिवार के प्रत्येक परिजन को प्रतिस्पर्धा पूर्वक आत्म-योग प्रदान
करना चाहिए। छुटपुट अनेक पुण्य-परमार्थों की बात सोचने पूर्णं करना
चाहिए। संस्कृति-सीता को अज्ञान-असुर के चंगुल से छुड़ाना हम रीछ-वानरों
का एक ही लक्ष्य और एक ही कार्यक्रम होना चाहिए। अनेक दिशाओं में न
भटकें, अपनी समस्त श्रद्धा इस एक ही बिन्दु पर केनिद्रत करें। हनुमान की
तरह- ”राम काज कीन्हें बिना मोहि कहाँ विश्राम की एक ही रट लगानी चाहिए
और अपने को तिल-तिल जलाकर संसार में सदज्ञान का प्रकाश विकीर्ण करने वाले
इस ज्ञान दीप को, ज्ञानयज्ञ को प्रदीप्त रखने में बड़े से बड़ा
पुरुषार्थ, त्याग-बलिदान करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
+ आपके पास जो भी घटना, परिसिथति, व्यकित या विचार आए,
प्रत्येक के ऊपर कसौटी लगाइए और देखिए कि इसमें क्या उचित है और क्या
अनुचित? कौन नाराज होता है और कौन खुश होता है-यह देखना बंद कीजिए। यह
दुनिया ऐसे पागलों की दुनिया है कि अगर आपने यह विचार करना शुरू कर दिया
कि हमारे हितैषी किस बात में प्रसन्न होंगे, तो फिर आप कोर्इ सही काम
नहीं कर सकते। अगर आपको भगवान को प्रसन्न करना है और अपने र्इमान को
प्रसन्न करना है, जीवात्मा को प्रसन्न करना है, तो लोगों की नाराजगी और
प्रसन्नता की बाबत विचार करना एकदम बंद कर देना पड़ेगा। हमको भगवान की
प्रसन्नता की जरूरत है, लोगों की प्रसन्नता की नहीं।
+ युग निर्माण का आरम्भ व्यकित परिवर्तन की उग्र प्रक्रिया
के साथ आरम्भ होगा। इसके लिए भगवान ऐसा सूक्ष्म प्रेरणा-प्रवाह उत्पन्न
कर रहे हैं, जो हर जीवित और जाग्रत आत्मा को व्याकुल-बेचैन कर दे। अपनी
सिथति पर पुनर्विचार करने के लिए हर घड़ी विवश करे और उसे घसीटकर उस
स्थान पर खड़ा कर दे, जहाँ स्वतंत्र चिंतन अनिवार्य हो जाता है। विवेक का
प्रकाश जब अपनाया जाता है, तब अंधेरे की आशंकाएँ और विभीषिकाएँ सभी
तिरोहित हो जाती हैं। र्इश्वरीय प्रकाश विवेक के रूप में अवतरित होता हैं
और जहाँ भी वे दिव्य किरणें पड़ती हैं, वहाँ अंधानुकरण एवं पूर्वाग्रहों
का विनाश होता है। मनुष्य इतना साहस अनुभव करता है कि औचित्य के मार्ग पर
अकेला ही चल पड़े। भले ही उसके तथाकथित शुभचिंतक उसके लिए उसे
रोकते-टोकते ही रह जाएँ।
+ आत्म परिवर्तन के साथ -साथ यही जाग्रत आत्माएँ विश्व
परिवर्तन की भूमिका प्रस्तुत करंगी। प्रकाशवान ही प्रकाश दे सकता है। आग
से आग उत्पन्न होती है। जागा हुआ ही दूसरों को जगा सकता है। जागरण की
भूमिका जाग्रत आतमाएँ ही निभाएँगी। आत्म परिवर्तन की चिनगारियाँ ही युग
परिवर्तन के प्रचण्ड दावानल का रूप धारण करेंगी। यही सब तो इन दिनों हो
रहा है। जाग्रत आत्माओं में एक असाधारण हलचल इन दिनों उठ रही है। उनकी
अन्तरात्मा उन्हें पग-पग पर बेचैन कर रही है, ढर्रे का पशु जीवन नहीं
जियेंगे, पेट और प्रजनन के लिए, वासना और तृष्णा के लिए जिन्दगी के दिन
पूरे करने वाले नर-कीटों की पंक्ति में नहीं खड़े रहेंगे, र्इश्वर के अरमान
को निरर्थक नहीं बनने देंगे। लोगो का अनुकरण नहीं करेंगे, उनके
लिए स्वत: अनुकरणीय आदर्श बनकर खड़े होंगे। यह आंतरिक समुद्र-मंथन इन
दिनों हर जीवित और जाग्रत आत्मा के अंदर इतनी तेजी से चल रहा है कि वे
पुराने ही हैं, पर भीतर कौन घुस पड़ा, जो उन्हें ऊँचा करने के लिए भी
विवश, बेचैन कर रहा है। निशिचत रूप से यह र्इश्वरीय प्रेरणा का अवतरण है।
+ इस समय आपको भगवान का काम करना चाहिए। दुनिया में कोर्इ
व्यकित भगवान का केवल नाम लेकर ऊँचा नहीं उठा है। उसे भगवान का काम भी
करना पड़ा है। हनुमान ने कितनी उपासना की थी, नल-नील, जामवन्त, अर्जुन ने
कितनी पूजापाठ एवं तीर्थयात्रा की थी , यह हम नहीं कह सकते? परन्तु
उन्होंने भगवान का काम किया था। भगवान ने भी उनके कार्यो में कंधे से
कंधा मिलाया था। ये लोग घाटे में नहीं रहे। अगर आप भगवान का नाम लेकर
अपने आपको बहकाते रहे, भगवान को बहकाते रहे, तो आप खाली हाथ ही रहेंगे।
+ जो युग निर्माण हम करने चले है, उसका बड़ा और कारगर हथियार हमारे पास
है, वह है हमारा व्यäतिव और चरित्र। हमको जो भी कार्य करना है, जो कोर्इ
भी सहायता प्राप्त करनी है, वह रामायण, गीता, यज्ञ या धार्मिक
व्याख्यानों के माध्यम से नहीं पूरा होने वाला है। अगर किसी तरह से हमारे
मिशन को सफलता मिलनी है और वह उददेश्य पूरा होना है, तो वह आपका चरित्र
ही-आपका व्यकिäत्व ही एक मार्ग है-एक हथियार है।
–पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी